स्वप्न और जाग्रति
तुम हो मेरे प्यार का स्वप्न
तुम ही मेरी जाग्रति भी
माना कि मेरे भुवन का
सत्य है बस कल्पनाएं
मन की हलचल में अटलता
है समोती भावनाएं
पर उस अमापित शून्य का
बस एक ही है केंद्र बिंदु
आँसू की एक बूँद में है
तेरी प्रीत का असीम सिंधु
तुम ही निर्गुण आस्था मेरे प्रेम की हो
तुम ही उसकी आकृति भी
तुम हो मेरे प्यार का स्वप्न
तुम ही मेरी जाग्रति भी
जग में फैला है वहम कि
मैं स्वयं को खो चुका हूँ
कैसे समझाऊं उन्हें कि
मैं स्वयं में खो चुका हूँ
काटकर मन के अँधेरे
जितना तुमको पा रहा हूँ
सत्य को तकता स्वयं के
पास उतना आ रहा हूँ
तुम ही शाश्वत खोज मेरे अस्तित्व की हो
तुम ही सर्वस्व मैं की प्राप्ति भी
तुम हो मेरे प्यार का स्वप्न
तुम ही मेरी जाग्रति भी

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