Thursday, January 8, 2015

वह एक फाइल के पीछे छिपी थी 

कभी-कभी किसी दृशय की पुनरावृत्ति इतनी अधिक बार हो जाती है कि हम उसे देखते हुए भी अनदेखा करने लगते हैं. और फिर जब कभी भूल से सच में उस दृशय को देख लेते हैं, तो लगता है कि यह सब इतनी बार मेरे सामने, मेरे देखते-देखते हुआ, फिर भी मैं इसे देखता ही क्यों रह गया! यह ऐसी ही एक घटना थी. 

यह साल २०१५ के पहले शनिवार की संध्या थी. मैं हिंदी साहित्य के पुरोधा आदरणीय धर्मवीर भारती जी की कालजयी रचना 'गुनाहों का देवता' अपने हाथ में और खुद के हिंदी साहित्य के ज्ञाता और एक लेखक होने के अहंकार को साथ में लेकर मैं आनंद विहार मेट्रो स्टेशन AFC निकासी द्वार पर अपने नंबर आने की प्रतीक्षा करता हुआ लम्बी कतार में लगा था. कतार में मेरे आगे एक २३-२४ वर्ष की  युवती खड़ी थी. क्योंकि पंक्ति में वह मुझसे आगे खाड़ी थी, अतः मैं उसका चेहरा नहीं देख सकता था। परन्तु कद-काठी से वह सामान्य-सी ही दिखने वाली कोई युवती मालूम पड़ती थी. उस दिन ठण्ड काफी थी, अतः उस युवती ने सिर पर टोपी पहन रखी थी, सामान्य-सा एक सलवार-सूट, उसके ऊपर एक जैकेट और कंधे पर तिरछा करके एक बैग भी लटका रखा था. वेशभूषा से लगता था कि वह किसी दूसरे शहर या कस्बे से आकर दिल्ली में पढाई या नौकरी करती होगी। यह सब मेरे लिए बिलकुल सामान्य था. मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि वह सामान्य-सी दिखने वाली युवती उस समय कितना असाधारण पराक्रम दिखा रही थी. वह मेरे कानों तक पहुँचने वाले कद की लड़की एक A4 साइज की फाइल के पीछे खुद को छिपाने की कोशिश कर रही थी. 

मैं उस युवती के इस असाधारण पराक्रम से अनभिज्ञ रह जाता अगर वह दूसरी पंक्ति में लगभग हमारे समानांतर चल रहे उस युवक पर चिल्लाई न होती. कुछ क्षणों पहले ही यह युवक अपनी पंक्ति छोड़कर हमारी और उसकी पंक्ति के बीच के गलियारे में आ खड़ा हुआ था. प्रथम दृष्टया मुझे लगा की यह युवक शायद जल्दी में है, इसलिए हमारी हमारी पंक्ति में आकर तेजी से निकलना चाहता है. लेकिन मैं भी पूरी तरह सतर्क था और मैंने तेजी से आगे बढ़कर उस युवक को यह सूचित कर दिया कि अभी मैं किसी भलमनसाहत के मूड में नहीं हूँ. लेकिन यह क्या! दरअसल जो मैं सोच रहा था वह उस युवक का उद्देश्य था ही नहीं. उस युवक ने अपनी गर्दन जरा-सी झुककर मेरे आगे खड़ी युवती के कान में कुछ कहा. मुझे यह भी सामान्य लगा. मेरा सोचना था की शायद वह युवक उस युवती का कोई मित्र, साथी या परिचित होगा. अब वह युवती निकासी द्वार से ३-४ व्यक्तियों की दूरी पर थी. तभी उस युवक ने अपना बांया हाथ उस युवती के आगे एक अवरोध-सा लगा दिया और बड़े ही वहशीपन के साथ बोला - "अरे हमे भी निकल जाने दो!" और यह कहकर उसने झट से अपना हाथ युवती की छाती कर लगा दिया. छाती के आगे वह फाइल थी जिसके पीछे वह युवती छिपी हुई थी. अतः उस मनचले युवक का हाथ बस उस फाइल से ही टकराकर रह गया. इसके बाद जो हुआ  उससे मेरे सामने न सिर्फ सही स्थिति आई, बल्कि वह पराक्रम भी आया जो मैं जीवन में न जाने कितनी बार देखकर भी अनदेखा कर चुका था.   

उस मनचले युवक का हाथ अपनी छाती के आगे लगी फाइल से टकराते ही उस युवती ने एक असाधारण रूप धारण किया जिसकी शायद मैंने कल्पना नहीं की थी. वह उग्र तो नहीं पर समग्र दुर्गा का रूप ले चुकी थी. उसकी वाणी में जहाँ रणचंडी की पिपासा का उद्घोष था, वहीँ व्हवहार में देवी सती की सात्विकता थी. वह एक सधी-सी आवाज में उस युवक के ऊपर चिल्लाई - "क्या परेशानी है तुम्हे?" 

उसके चिल्लाते ही वह मनचला युवक और दूसरी पंक्ति में खड़े उसके दो साथी जोर-जोर से अट्ठाहस करने लगे. घटनाक्रम समझ आने के बाद मुझे ज्ञात हुआ कि कलियुग के महिषासुरों को अब दुर्गा के उस भयंकर काली रूप से भी डर नहीं लगता, बल्कि वे उसका उपहास उड़ाते हैं. ऐसा हो भी क्यों नहीं जब शिव ही अपना रूद्र-रूप भूलकर तप-योगी बनकर रह चुके हैं तो शक्ति के रौद्र में दुष्टों को वह तांडवमयी प्रलयंकर कैसे दिखेगा. पूर्वारोक्त वाक्य मेरी और वहां उपस्थित मेरे सहयात्रियों के व्यवहार पर प्रकाश डालता है. 

खैर, अगले २-३ मिनटों की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं से जितना मुझे समझ में आया, तो घटनाक्रम यह था कि इन तीन मनचलों की यह टोली शायद मेट्रो में पीछे से उस युवती का पीछा करती चली आ रही थी. और यहाँ मेट्रो स्टेशन के निकासी के द्वार पर आकर उन्होंने अपने दुस्साहस की हर सीमा लांघ दी थी क्योंकि उन्हें पता था की वे यहाँ से आसानी से बचकर भाग सकते हैं.

युवती की चिल्लाने के बाद उन मनचलों ने और कोई दुस्साहस तो नहीं किया, पर वे ज्यादा भयभीत भी नहीं थे. वे लगातार राक्षसी अट्ठाहस कर रहे थे. क्षण भर में ही उन लड़कों का निकासी द्वार पर नंबर आ गया और एक के बाद एक क्रम से वे तीनों अट्ठाहस करते हुए बाहर निकल गये. लगभग उसी समय वह युवती और मैं भी निकासी द्वार से बाहर निकले. वह युवती निकासी द्वार से बाहर आकर कुछ क्षणों के लिए ठहर गयी. मनचले युवक तेजी से सीढ़ी पर अट्ठाहस करते हुए उतरने लगे और देखते ही देखते आँखों से ओझल हो गये. वह युवती वहीँ खड़ी थी. शायद वह  उन मनचलों को निकल जाने देना चाहती थी. मैं भी कुछ क्षणों के लिए न  जाने क्यों, मगर रुका था. फिर धीरे-धीरे मैं भी सीढ़ियों की ओर आगे बढ़ने लगा. सीढ़ी से कुछ क़दमों की दूरी पर मैंने मुड़कर उस युवती की ओर देखा. सहसा उसकी और मेरी नज़रें टकरा गयीं. उसने जिस दृष्टि से मुझे देखा, उससे मुझे लगा कि जैसे उसे यह ज्ञात था कि मैं वही हूँ जो पंक्ति में उसके पीछे खड़ा था. उसकी नज़रों में पहला भाव लज्जा का था. लज्जा - जो हुआ उसके लिए नहीं, बल्कि जिस वजह से हुआ उसके लिए. वजह शायद यह थी कि वह एक नारी थी जिसे समाज ने या तो उपभोग अथवा एक दुरूपयोग की  वस्तु  बना डाला है. उसकी आँखें कुछ इस तरह डबडबायी हुई थीं कि वर्तमान की गंगा का मूर्त रूप लगती थीं. उसके अश्रु-जल में गंगाजल-सा सामर्थ्य था, जो यूं तो दूसरों के सारे पाप, सारी अशुद्धियाँ धो सकता है, किन्तु खुद गंगा को ही मैला होने से नहीं बचा पाता. उसकी आँखों से अनछलके इन आंसुओं ने मेरे मन के काफी भ्रमों को धो डाला था, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण भ्रम यह था की मनुष्य भगवान की सर्वश्रेष्ठ कृति है. 

मेरे लिए यह अनुषव काफी विस्मयकारी था कि किस तरह किसी अनजान व्यक्ति के अश्रु मेरी आँखों और मन पर चढ़ी मैल की परत धोने में सक्षम थे. अब मैं काफी कुछ साफ़-साफ़ देख पा रहा था. इसलिए अब मैं उन आँखों से बात कर पाने में समर्थ था. 

कुछ क्षणों की उस वार्तालाप के शुरू होने के पहले ही क्षण में युवती की आँखों के आँसू सूख गए और लज्जा के उस भाव ने ऐसे परिहास का रूप धारण कर लिया जिससे मुझे स्वयं पर लज्जा आने लगी. मैं ज्यादा देर तक उसकी आँखों में न देख सका. लज्जा से नज़रें झुकाई तो नज़र उसकी फाइल पर पड़ी. उसने उस फाइल को ऐसे पकड़ा था मानो वह फाइल फाइल एक ढाल हो जिससे वह स्वयं की रक्षा करती है. मैंने नज़र उठाकर वापस उसकी नज़रों में देखा तो उसके भाव फिर बदल चुके थे. इस बार उसकी आँखों में स्वाभिमान का भाव था - जैसे मुझसे कह रही हों, "अरे जा कायर! मुझे तुम्हारे जैसे पुरुषों की कोई जरुरत नहीं. मेरे पास हथियार नहीं तो क्या ढाल तो है. मैं अपनी रक्षा स्वयं कर सकती हूँ!" 

मैंने पुनः घबराकर नज़रें हटा लीं. अब मैं सीढ़ियां उतर रहा था. वह युवती मेरे पीछे आ रही थी. मैं उसकी उन आँखों से भागने की कोशिश कर रहा था. थोड़ा आगे बढ़ने के बाद मैंने यह सुनिश्चित करने के लिए पुनः पीछे मुड़कर देखा की कहीं अब तो वे निगाहें मेरा पीछा नहीं कर रहीं. पर भय तो हमेशा मनुष्य के साथ ही चलता है. ज्यों ही पीछे मुड़कर देखा तो वह फाइल  आँखों के सामने थी. मेरी नज़रें फिर उस युवती से मिलीं. इस बार फिर एक नया भाव उन आँखों में था. यह भाव था धिक्कार का! इस बार वे आँखें मुझे बता रही थीं कि मुझसे बेहतर तो यह फाइल थी जो इतनी छोटी होकर भी इतना बड़ा काम कर सकती थी. अपने से २० गुना आकार की उस युवती को अपने पीछे छिपा सकती थी. उस मनचले के आघात का विरोध कर सकती थी. वह निर्जीव होकर भी मूक नहीं थी. और मैं सजीव होकर भी पूर्णतः मूक था. मैंने एक मूक दर्शक बनकर नारीत्व पर हुए इतने बड़े अत्याचार को देखा था. उस वक़्त मैं निष्क्रिय, निर्विरोध, निर्भाव खड़ा था. जब वे मनचले उस युवती का उपहास उड़ा रहे थे तब भी मैंने कुछ नहीं कहा. शायद मैं भयभीत था या मुझे उस युवती की पीड़ा से कुछ मतलब ही नहीं रहा था. होता तो मैं विरोध जरूर करता. मैं उसकी नज़रों के समक्ष आत्म-समर्पण कर चुका था और मान चुका था की मुझसे से बेहतर वह फाइल थी. 

दो मंज़िल की सीढ़ियों और कुछ क्षणों का यह सफर मेरे लिए एक सदी-सा बीत रहा था. अब हम मेट्रो स्टेशन के भूतल पर पहुँच चुके थे. इस समय तक वह युवती मुझे क्षमादान देती हुई सफर और ज़िन्दगी, दोनों में आगे निकल चुकी थी. पर वह शायद उस घटना को नहीं भूली थी. उसके साथ अभी भी उन मनचलों के दुस्साहस की यादें और उनसे उसकी रक्षा करने वाली वह फाइल थी. उसने फाइल को वैसे ही ढाल की तरह अपने सीने से लगा रखा था. जिस तरह  फाइल को अपने सीने से लगाया था, उसे दूर से देखने पर लगता था कि मानो पूरी दुनिया में बस वह फाइल ही उसकी अपनी थी. वह निरंतर खुद को उस फुट भर की फाइल के पीछे समेटने की कोशिश कर रही थी. एक कदम पर उसका यह प्रयास सफल और दुसरे पर असफल लगता था. एक कदम पर उसका साहस और आत्म-सम्मान हिलोरे लेता था, तो दूसरे कदम पर उसकी बेबसी और अविश्वास छलक जाता था. ऐसे ही तेजी से डगें भरती, फाइल की आड़ में छिपती-छिपाती वह पावन सरिता भीड़ के अथाह सागर में समाकर मेरी दृष्टि से ओझल हो गयी और मुझे आत्म-मंथन योग्य विचारों के साथ छोड़ गयी. 

इसके बाद मैंने आनंद विहार बस अड्डे से अपने गृह-नगर पिलखुवा के लिए बस पकड़ी. यह करीब डेढ़ घंटे की यात्रा थी जो मुझे खुद के, और उन आँखों के साथ हुए संवाद की यादों के साथ चिंतन करते हुए तय करनी थी. आत्म-संवाद की शुरुआत में मैंने सोचा कि हो सकता है की मेरे कवि ह्रदय में कल्पनाशीलता नामक तत्व की तनिक अधिकता के कारण मैंने उस युवती और इस घटनाक्रम के बारे में एक मनगढ़त कहानी रच ली है. किन्तु फिर दूसरा तर्क सामने आया. वह भी यथार्थ के काफी समीप था. उसके अनुसार, हो सकता है की जैसा मैंने उस घटनाक्रम के बारे में सोचा, वह उतना गंभीर न भी हो. किन्तु, उस क्षण में वह युवती सम्पूर्ण नारी समाज का और मैं पुरुष समाज और सकल समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. मेरी चुप्पी पूरे पुरुष समाज और समाज की चुप्पी थी. जब हम समाचार पत्रों या टेलीविज़न के माध्यम से किसी नारी पर हुए अत्याचार या बलात्कार की खबर हैं, तो बस क्षण भर के लिए जो हुआ उसकी निंदा कर लेते हैं और सोच लेते हैं की  वहां होते तो जाने उस समय क्या कर डालते, लेकिन जब हम वास्तव में ऐसी किसी घटना या परिस्थिति का हिस्सा होते हैं, तो अधिकतर या तो मौन होते हैं अथवा गौण! यही मानव चरित्र की विडम्बना है. 

खैर, हो सकता है कि यह एक सार्वभौमिक सत्य न होकर मेरे चरित्र की व्यक्तिगत दुर्बलता हो - जिसे स्वीकार करने में मुझे जरा भी संकोच नहीं . पर फिर सोचता हूँ कि एक व्यक्ति की दुर्बलता भी तो सामाजिक दुर्बलता की परिचायक हो सकती है. आखिर समाज व्यक्तियों से ही तो बनता है. और व्यक्ति के चरित्र निर्माण में समाज की महती भूमिका होती है. 

इसी तरह आत्म-चिंतन करते हुए डेढ़ घंटे का बस का सफर और डेढ़ किलोमीटर की पगयात्रा कब बीती कुछ पता नहीं चला. इस बीच में अनगिन बार मेरी आँखों के सामने बसों, बाजारों, रेलों, आदि में किसी फाइल, किसी किताब, किसी बस्ते, किसी पर्स के पीछे छिपने की कोशिश करती अनगिन युवतियों और महिलाओं की तस्वीरें आयीं, आखिर घर पहुँचने से पहले मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा की यदि समाज उस युवती के साथ हुई घटना पर मेरी तरह ही मौन अथवा गौण रहा, तो हम मनुष्यों से बेहतर वे फाइल, रजिस्टर, किताबें, बस्ते, इत्यादि ही होंगे. क्योंकि वे सब नारी के सम्मान की सुरक्षा में समाज से बेहतर योगदान कर रहे हैं. यह एक सार्वभौमिक सत्य भी है. क्योंकि समाज यदि वास्तव में इस दिशा में गंभीरता से सोचेगा तो न सिर्फ उन मनचलों के मन में समाज का भय होगा, बल्कि समाज उस तरह के व्यक्तित्व को आकार ही नहीं लेने देगा. आखिर व्यक्तित्व के निर्माण में समाज सबसे बड़ी भूमिका निभाता है. इस सोच के साथ मैंने आत्म-संकल्प किया कि भगवान न करे, मगर अगली बार यदि ऐसा कुछ मेरे सामने हुआ तो मैं मूक नहीं रहूँगा और अपनी मनुष्यता का प्रमाण देते हुए साबित कर दूंगा कि मैं कम से कम किसी फाइल से तो बेहतर हूँ. मुझे विश्वास है कि अगर आप भी अपने चारों ओर देखेंगे तो इस तरह की अनेक घटनाएं पाएंगे. उस समय आप कम से कम मेरी जैसी तुछ्ता दिखाकर नारी को किसी निर्जीव वास्तु के सहारे छोड़ मूक मत रहियेगा. आवाज़ उठाइएगा. 

खैर, ऐसा सोचते हुए जब मैं मेरे समाज की प्रथम इकाई अथवा घर पर अपने परिवार के बीच पहुंचा तो मेरी आँखों के सामने चाँद वे नारी थीं जिनके सम्मान की रक्षा का दायित्व मैं अपने ऊपर समझता हूँ - मेरी माँ, बहन, पत्नी और पुत्री-तुल्या भांजी. उस दिन मैं उनसे नज़रें मिलाने में असहज महसूस कर रहा था. नज़र झुकाई तो हाथ में पकड़ी पुस्तक के शीर्षक की और ध्यान गया - 'गुनाहों का देवता'! उस क्षण लगा कि कुछ घटनाएं शायद समय हमें कुछ बताने, दिखाने और समझाने के लिए निर्धारित करता है. 
      

2 comments:

mythicalConnection said...

Your blog left me with great sense of discomfort...for the girl, for today's situation. It also leaves a question with every reader to ponder upon. It is time for some introspection.

What would I have done if I was there? and I think if the blog has atleast made a person introspect, your objective is achieved.

If every man who was standing there in the queue, had this thought flashed once, in his mind, what if she was his sister or daughter? He would not have kept quite.

Shashank Khandelwal said...

Thanks for your valuable comments Manisha. My whole objective of doing the article was to not just invoke the responsible behavior in such a situation, but also to make the society realize that even if one person fails, it is the failure of the entire society. Every action has a reaction and every reaction has the potential to inspire a chain of reactions.

If I would have raised my voice, or stopped those goons, may be the public might have also supported me, the police might have caught them, they might have got their lessons, their behaviour might have changed, people must have become aware of what to do in such a situation.

Alas! Nothing happened.

Secondly, we always think that it's someone else's responsibility. I wanted to attack on that notion. That's why I honestly admitted that it was me who was present there. I could have easily replaced myself with a fictitious character. And surely that would have given me more liberty to express the internal feelings of a sensitive man in that situation. But I thought honest is the best policy.