घोड़े की वेदना
इस घटना के एक रोज़ पहले शाम को ही मेरे एक मित्र ने मेरे ब्लॉग पर मेरे पुराने लेखों को पढ़कर मुझे चेताया था कि मैं आजकल अपने पुराने परिश्रम का ही लाभ उठा रहा हूँ. चिंतन के स्तर पर मैंने पिछले कुछ समय में कोई प्रगति नहीं की है. उसके ऐसे वचन सुनकर मैंने इसपर गहन आत्म-चिंतन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वास्तव में मेरा मित्र सही कह रहा था. एक लम्बे अरसे से मैंने जैसे स्वयं पर से विश्वास ही खो दिया था. आजकल मैं सिर्फ चिंता करता था जिस कारण मेरे पास चिंतन का समय काफी काम रह जाता था. एक अजीब-से अविश्वास के बवंडर में घिरकर जैसे मैंने आत्म-समर्पण-सा कर दिया था और किंकर्तव्यविमूढ़ता से होकर मैं अब निष्क्रियता के पथ पर अग्रसर था. और फिर यह घटना हुई. अब सोचता हूँ तो लगता है कि जैसे सारा घटनाक्रम पूर्वनियोजित था. वह तत्व जिसे मैं ईश्वर नाम से जानता और सम्बोधित करता हूँ, उस परमात्मा ने मुझे वापस कर्मण्यता के सुपथ पर उतारने की ठान रखी थी. वह मेरी अंतरात्मा की उस वेदना से भली-भांति परिचित था जिसे मैं पिछले काफी समय से झेल रहा था. तभी तो इतने दिनों में पहली बार ऐसा हुआ था कि मेरी इच्छा तथा परिस्थितियां एक साथ किसी यात्रा के लिए अनुकूल हुई थी. इससे भी बड़ी बात यह है कि इस यात्रा पर निकलने से पहले ही मैंने निश्चय कर लिया था कि पूरी यात्रा के दौरान मुझे पूर्वाग्रहों और छद्म अभिमान से मुक्त रहते हुए बस अनुभूति के चरम पर पहुंचना है. अभिव्यक्ति की चिंता को मैंने घर पर ही विश्राम करने के लिए छोड़ दिया था. अब मैं सिर्फ मैं था. खुले दिल से हर अनुभव को स्वीकार करने के लिए तैयार. तभी मैंने कहा कि इसके पीछे एक शक्ति कार्यरत थी क्योंकि इतने सारे संयोग मात्र संयोग नहीं होते.
अगले दिन सुबह पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मुझे अपनी जीवनसंगिनी संग मंडी गोबिंदगढ़, पंजाब के लिए प्रस्थान करना था. तय कार्यक्रमानुसार हमने कश्मीरी गेट आईएसबीटी से पंजाब रोडवेज की एक बस पकडी. बस ने अभी थोड़ी दूरी ही तय की थी तभी 'मजनू का टीला' नामक स्थान के पास एक लाल-बत्ती पर बस रुक गयी. यही वह समय था जब मेरा परिचय इस घटनाक्रम के मुख्य पात्र उस चोटिल घोड़े से हुआ. दो घोड़ो की बग्गी में बंधा यह घोडा जैसे ही वहां आकर रुका, मेरे अंतर्मन को सहसा ही आभास हुआ की यह घोडा जाने किस विकट पीड़ा में है. यह घोडा अपना आगे वाला बांया पैर बार-बार तेजी से ज़मीन पर पटक रहा था. उसके खुर के चिन्ह सड़क पर अंकित हो चुके थे. उसी समय उस घोड़े की ओर मेरी पत्नी की नज़र गयी और उसने मुझसे कहा की देखो यह घोडा कितनी मस्ती में झूम रहा है. मैंने यह सुनते ही उससे कहा कि घोडा किसी मस्ती में झूम नहीं रहा है बल्कि मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे यह दर्द के कारण बुरी तरह बेचैन है. इस समय तक मैं और मेरी पत्नी हम दोनों उस घोड़े की वास्तविक अवस्था से अनभिज्ञ थे. मेरी पत्नी घोड़े की अवस्था के विषय में अपना निर्णय सुनाकर शायद उसके प्रति भाव-शून्य हो चुकी थी. किन्तु मेरा मन अभी तक घोड़े और उसकी अनकही पीड़ा पर ही केंद्रित था. तभी वह बग्गी एक कदम आगे बढ़ी और घोड़े की वास्तविक अवस्था हमें ज्ञात हुई. हमने देखा कि घोड़े के उस पैर से, जिसे वह बार-बार पटक रहा था, लगातार खून बह रहा था. ज़ख्म काफी गहरा दिखाई पड़ता था. ऊपर से वह भीषण ठण्ड और साथ में पीठ पर लदा हुआ कुन्तलों वज़न घोड़े की पीड़ा को और भी बढ़ा रहे थे. थोड़ी देर में लाल-बत्ती हरी हो गयी और हमारी बस तेज रफ़्तार से उस बग्गी को पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गयी और देखते ही देखते वह घोडा मेरी दृष्टि से ओझल हो गया.
ईमानदारी से कहूँ तो सामान्य तौर पर मुझे पशुओं से ज्यादा सहानुभूति कभी नहीं रही. पर आज जाने क्या अलग था. मैं जैसे उस घोड़े की पीड़ा को अपने तन पर अनुभव कर सकता था. ६ घंटे के सफर का आधे से ज्यादा समय मैं उस घोड़े और उसकी पीड़ा में ही खोया रहा. घंटों बाद तक मेरे पैर उस घोड़े के दर्द से चपक रहे थे, मेरे कानों में उसके खुरो की थाप अभी तक गूँज रही थी और मैं आँख बंद करके भी उस घोड़े द्वारा सड़क पर अंकित उस असीम पीड़ा की कहानी को पढ़ सकता था. मुझे लग रहा था जैसे प्रकृति उस घोड़े के माध्यम से मुझ तक अपना कोई सन्देश पहुँचाना चाहती थी. यह चिंतन का अगला पड़ाव था. अब मैं निरंतर यह सोचने में व्यस्त था की वह क्या सन्देश है जिसका मुझ तक पहुंचना एक नियति है. चिंतन की और गहराई में जाने के पश्चात मुझे यह आभास होने लगा कि यह घोडा वस्तुतः मेरी ही आंतरिक अवस्था का प्रतिबिम्ब है. मुझे ऐसा लगने के पीछे मेरे अपने तर्क हैं.
अब से लगभग ७-८ वर्ष पूर्व जब मैंने अपनी दुकान छोड़कर नौकरी में जाने का निश्चय किया था, उस समय मैं भी एक अश्व के जैसा ही था. मेरे भीतर अपार ऊर्जा थी, उत्साह का तेज मेरी आँखों में चमकता था और दिल आकाश तक दौड़कर जाने के स्वपन रखता था. फिर जब मैंने पब्लिक रिलेशंस छोड़कर स्वयं को पूरी तरह कलम के सुपुर्द किया तो यह मानो ऐसा था जैसे उस स्वतंत्र अश्व को अम्बर तक पहुँचने का मार्ग मिल गया हो. अब कोई मंज़िल दूर नहीं थी. लेकिन यह क्या उस घोड़े को अब दौड़ते-दौड़ते क्षुधा का आभास होने लगा था. अब वह आकाश की जगह घास तलाशने लगा. उसका मानना हो गया था कि लगातार दौड़ने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता है और ऊर्जा के लिए घास की. इसलिए उसने घास की सुलभ उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए दूसरों के लिए घुड़दौड़ में दौड़ना भी स्वीकार कर लिया. पर उसे क्या पता था, नौकरी तो आखिर नौकरी ही होती है. उसने दौड़ने के लिए खूंटे से बंधना स्वीकार कर लिया था. उसके बाद क्या था, स्वतंत्र दौड़ने के संकल्प से निकला घोडा अब सिर्फ सामान और सवारियों को ढ़ोने दस काम आने लाग था. वह दौड़ना जैसे भूल ही चुका था. बस उस घोड़े जैसी अवस्था ही थी मेरी भी. कभी अपनी क्षमताएं ही बोझ लगती थीं तो कभी निजी आवश्यकताएं व अपेक्षाएं प्रतिकूल मौसम और ज़ख्म-सी बन जाती थीं. शायद यही कारण था कि मैं उस घोड़े की वेदना को इतनी भली-भांति समझ पा रहा था. यह वेदना मेरी आंतरिक चेतना का ही प्रतिबिम्ब थी जो एक शक्ति मुझे दिखाना चाह रही थी. साथ ही वह मुझे यह भी बताना चाह रही थी कि अगर मैंने समय रहते खुद को नहीं संभाला तो मैं भी अपनी कलम की स्याही से उस घोड़े द्वारा अंकित किये गए बेबसी के चिन्ह मात्र ही उत्पन्न कर पाऊंगा.
मेरी चेतना ने उस घोड़े की वेदना में छुपे प्रकृति के गुप्त सन्देश को पा लिया है. मैंने आजतक जो भी लिखा है, जो भी अब लिख पा रहा हूँ था भविष्य में भी जो कुछ लिखूंगा उसकी प्रेरणा वह परमशक्ति ही है. मैं तो विचारों को शब्दों की आकृति देने का एक साधन मात्र हूँ. यहाँ मैं यह संकल्प करता हूँ कि अब कलम ने जो गति पकड़ी है इसपर अब कोई विराम नहीं लगने दिया जायेगा. मैं यह बात खुद तक सीमित रखकर भी आगे बढ़ सकता था, किन्तु प्रकृति को यह बताने के लिए कि उसका सन्देश मुझ तक पहुँच चुका है, मैंने इससे कलमबद्ध करने का निश्चय किया. अब यह कलम यूं ही दौड़ती रहेगी और उसके साथ ही दौड़ती रहेगी यह ज़िन्दगी भी.
चरिवेति, चरिवेति, चरिवेति!

3 comments:
Indeed very heart wrenching story. But I liked the way you have related it with your emotional turmoil... and more that you have channalized it towards positive and constructed thoughts.
Keep it up..
Manisha
Thanks a lot, Manisha! Please keep reading and commenting, so that I can keep writing consistently.
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