Tuesday, December 30, 2014

खुद से खुद की सिफारिश 

जब छोटे-से थे तब से सुनते आ रहे थे कि आजकल कहीं भी सिफारिश के बिना कुछ नहीं मिलता. सिफारिश के बिना स्कूल-कॉलेज में दाखिला नहीं मिलता, बैंक से लोन नहीं मिलता, नौकरी नहीं मिलती, नौकरी में तरक्की नहीं मिलती. कई बार जिससे सिफारिश लगवानी है वह नहीं मिलता, तो कभी जिस तक सिफारिश पहुंचानी है, वह नहीं मिलता. तब हमें समझ में आया कि न सिर्फ कुछ पाने के लिए बल्कि लोगों से मिलने तक के लिए सिफारिश की जरूरत पड़ती है. 

अब हुआ यूं कि हमें भी एक महत्वपूर्ण व्यक्ति से मिलना था.और इसके लिए जरूरी थी किसी की सिफरिश. जानना चाहेंगे मुझे किससे मिलना था? अपने आप से! 

अब आपको लग सकता है कि मैं किसी नशे में यह बात लिख रहा हूँ. पर जनाब आपका अंदाज़ा गलत है! मैं वास्तव में अपने आप से ही मिलना चाहता था. और यह काम उतना आसान नहीं होता जितना अक्सर हम समझते हैं. लोगों की पूरी उम्र बीत जाती है पर उनकी खुद से कभी सही से मुलाकात नहीं हो पाती. कुछ तो ऐसे होते हैं जो इसके लिए कभी प्रयास ही नहीं करते, कुछ थोड़ी देर कोशिश करके हार मान जाते हैं, कुछ किसी छद्म को स्वयं मानकर खुश हो जाते हैं और कुछ विरले ही ऐसे होते हैं जो वास्तव में खुद से मिल पाते हैं. यह काम कितना कठिन हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया  जा सकता है कि खुद से मुलाकात होने के बाद अगली मुलाकात बस खुदा से ही होती है. यही कारण हैं कि ज्यादातर लोगों को सबसे ज्यादा भ्रम अपने आप के बारे में ही होते हैं. 

मुझे भी अपने विषय में काफी भ्रम-से होने लग गए थे. ये भ्रम वास्तव में भ्रम ही हैं, मैं इसका अनुमान भी नहीं लगा पा रहा था. इसलिए इन भ्रमों से मुक्ति पाने के लिए मुझे खुद से मिलना था - वह भी शीघ्रातिशीघ्र! तभी दिमाग में आया कि अगर सीधे रास्ते से चले तो इस कार्य में कई वर्षों का समय लग सकता है. अब क्या किया जाये? सिफारिश! इसी के ज़रिये हर काम को जल्दी से बनाया जा सकता है. यह बात तो तय हो चुकी थी कि अगर खुद से मिलना है तो मुझे एक सिफारिश की जरूरत है. अब  प्रश्न यह था कि खुद से मिलने के लिए किसकी सिफारिश लगायी जाए. कई दिन यह तय करने में बीत गए. अनिर्णय की अवस्था ज्यों की त्यों बनी हुई थी. इस कार्य को संपन्न करने के लिए अनेक विकल्प मेरे दिमाग में आए. कभी लगा किसी गुरु की शरण ली जाए, कभी लगा किसी अच्छे दोस्त से बात की जाए और कभी लगता कि चलो भगवान से ही पूछ लेते हैं. पर इसमें भी समस्या यह थी कि खुद से मिले बगैर तो भगवान से मिलना भी नामुमकिन है. खुद ही कुछ विकल्प सोचता था और फिर खुद ही आत्म-चिंतन करके उन्हें नकार देता था. 'सिफारिश किससे लगवायी जाए' यह प्रश्न 'सिफारिश कैसे लगवायी जाए' - इससे भी बड़ा हो चुका था. समस्या काफी विकट थी. 

काफी सोच-विचार करने के बाद दिमाग में यही आया कि जब कोई काम ना आए तो इंसान को ही खुद के काम आना पड़ता है. देखिये आ गई ना वही बात! सच यही है कि अधिकतर मामलों में हम अपने आप तक ही सबसे बाद में पहुँचते हैं. वह भी हर जगह से ठुकराये जाने के बाद! खैर, मैं भी अपनी ही शरण में जा पहुंचा था. अब शुरू हुआ आत्म-संवाद का दौर. मैंने खुद को बताया कि मुझे खुद से मिलना है, और शीघ्र मिलना है. इसलिए सिफारिश की जरुरत है. खुद ने कहा - "आज मन नहीं है, कल सोचते हैं!" कल भी हो ज्ञा. मैंने फिर खुद को कल के वादे की याद दिलाई. उत्तर फिर कल वाला ही था - "आज मन नहीं है, कल सोचेंगे!" इस तरह मिन्नतें करते हुए कई दिन, हफ्ते, महीने, साल बीत गए. अब खुद के नखरों से परेशान हो चुका था. धीरे-धीरे खुद से मिलने की इच्छा भी क्षीण होती जा रही थी. तभी एक दिन मैं खुद के व्यवहार से आश्चर्यचकित रह गया. मुझे ज्ञात हुआ कि खुद कि खुद से एक संक्षिप्त मुलाकात हो चुकी है  सिफारिश खुद के माध्यम से खुद तक पहुँच चुकी है. इसका असर भी काफी सकारात्मक हुआ. खुद से मेरी मुलाक़ात तय हो चुकी थी. मैं भी खुद से मिलने के लिए काफी बेकरार और पूरी तरह तैयार था. आखिर मुलाकात की बेला आई,

मैंने खुद को बताया कि मैं काफी समय से उसे ढूंढ रहा था. खुद की काफी मिन्नतें की इस मुलाक़ात को साकार करने के लिए. मिलने का प्रयोजन सिर्फ इतना है कि मुझे खुद के बारे में काफी भ्रम हो गए हैं. खुद से जवाब मिला कि मैं  नहीं हूँ जिसे खुद के बारे में भ्रम है. दुनिया भर के लोगों को खुद के बारे में भ्रम है. कुछ को खुद पर ही भ्रम है और बाकी खुद ही एक भ्रम हैं. खुद से वार्ता के दौरान यह भी ज्ञात हुआ कि भ्रम और सच्चाई में कोई भेद है ही नहीं. इसका कारण यह है कि यदि हम खुद के बारे में कुछ सोच लें तो बस हम खुद ही खुद को वह बना सकते हैं या उस मुकाम तक पहुंचा सकते हैं. खुद के बारे में कोई धारणा हमें तब भ्रम लगती है जब हमें खुद पर पूरा विश्वास नहीं होता. खुद पर अगर हम खुद ही विश्वास कर लें, तो हमें खुद से तो क्या खुदा से मिलने के लिए भी किसी सिफारिश की जरुरत नहीं है. मुझे खुद की बात खूब समझ आ चुकी थी. खुद से इसका भी भरोसा मिला है कि वह समय-समय आकर मुझसे मिलता रहेगा. मुझे तो खुद की सारी बातें खुद से समझ आ गई हैं. और आपको? खुद से पूछ कर देखिये… 
                       

Monday, December 29, 2014

घोड़े की वेदना 

इस घटना के एक रोज़ पहले शाम को ही मेरे एक मित्र ने मेरे ब्लॉग पर मेरे पुराने लेखों को पढ़कर मुझे चेताया था कि मैं आजकल अपने पुराने परिश्रम का ही लाभ उठा रहा हूँ. चिंतन के स्तर पर मैंने पिछले कुछ समय में कोई प्रगति नहीं की है. उसके ऐसे वचन सुनकर मैंने इसपर गहन आत्म-चिंतन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वास्तव में मेरा मित्र सही कह रहा था. एक लम्बे अरसे से मैंने जैसे स्वयं पर से विश्वास ही खो दिया था. आजकल मैं सिर्फ चिंता करता था जिस कारण मेरे पास चिंतन का समय काफी काम रह जाता था. एक अजीब-से अविश्वास के बवंडर में घिरकर जैसे मैंने आत्म-समर्पण-सा कर दिया था और किंकर्तव्यविमूढ़ता से होकर मैं अब निष्क्रियता के पथ पर अग्रसर था. और फिर यह घटना हुई. अब सोचता हूँ तो लगता है कि जैसे सारा घटनाक्रम पूर्वनियोजित था. वह तत्व जिसे मैं ईश्वर नाम से जानता और सम्बोधित करता हूँ, उस परमात्मा ने मुझे वापस कर्मण्यता के सुपथ पर उतारने की ठान रखी थी. वह मेरी अंतरात्मा की उस वेदना से भली-भांति परिचित था जिसे मैं पिछले काफी समय से झेल रहा था. तभी तो इतने दिनों में पहली बार ऐसा हुआ था कि मेरी इच्छा तथा परिस्थितियां एक साथ किसी यात्रा के लिए अनुकूल हुई थी. इससे भी बड़ी बात यह है कि इस यात्रा पर निकलने से  पहले ही मैंने निश्चय कर लिया था कि पूरी यात्रा के दौरान मुझे पूर्वाग्रहों और छद्म अभिमान से मुक्त रहते हुए बस अनुभूति के चरम पर पहुंचना है. अभिव्यक्ति की चिंता को मैंने घर पर ही विश्राम करने के लिए छोड़ दिया था. अब मैं सिर्फ मैं था. खुले दिल से हर अनुभव को स्वीकार करने के लिए तैयार. तभी मैंने कहा कि इसके पीछे एक शक्ति कार्यरत थी क्योंकि इतने सारे संयोग मात्र संयोग नहीं होते.  

अगले दिन सुबह पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मुझे अपनी जीवनसंगिनी संग मंडी गोबिंदगढ़, पंजाब के लिए प्रस्थान करना था. तय कार्यक्रमानुसार हमने कश्मीरी गेट आईएसबीटी से पंजाब रोडवेज की एक बस पकडी. बस ने अभी थोड़ी दूरी ही तय की थी तभी 'मजनू का टीला' नामक स्थान के पास एक लाल-बत्ती पर बस रुक गयी. यही वह समय था जब मेरा परिचय इस घटनाक्रम के मुख्य पात्र उस चोटिल घोड़े से हुआ. दो घोड़ो की बग्गी में बंधा यह घोडा जैसे ही वहां आकर रुका, मेरे अंतर्मन को सहसा ही आभास हुआ की यह घोडा जाने किस विकट पीड़ा में है. यह घोडा अपना आगे वाला बांया पैर बार-बार तेजी से ज़मीन पर पटक रहा था. उसके खुर के चिन्ह सड़क पर अंकित हो चुके थे. उसी समय उस घोड़े की ओर मेरी पत्नी की नज़र गयी और उसने मुझसे कहा की देखो यह घोडा कितनी मस्ती में झूम रहा है. मैंने यह सुनते ही उससे कहा कि घोडा किसी मस्ती में झूम नहीं रहा है बल्कि मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे यह दर्द के कारण बुरी तरह बेचैन है. इस समय तक मैं और मेरी पत्नी हम दोनों उस घोड़े की वास्तविक अवस्था से अनभिज्ञ थे. मेरी पत्नी घोड़े की अवस्था के विषय में अपना निर्णय सुनाकर शायद उसके प्रति भाव-शून्य हो चुकी थी. किन्तु मेरा मन अभी तक घोड़े और उसकी अनकही पीड़ा पर ही केंद्रित था. तभी वह बग्गी एक कदम आगे बढ़ी और घोड़े की वास्तविक अवस्था हमें ज्ञात हुई. हमने देखा कि घोड़े के उस पैर से, जिसे वह बार-बार पटक रहा था, लगातार खून बह रहा था. ज़ख्म काफी गहरा दिखाई पड़ता था. ऊपर से वह भीषण ठण्ड और साथ में पीठ पर लदा हुआ कुन्तलों वज़न घोड़े की पीड़ा को और भी बढ़ा रहे थे. थोड़ी देर में लाल-बत्ती हरी हो गयी और हमारी बस तेज रफ़्तार से उस बग्गी को पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गयी और देखते ही देखते वह घोडा मेरी दृष्टि से  ओझल हो गया. 

ईमानदारी से कहूँ तो सामान्य तौर पर मुझे पशुओं से ज्यादा सहानुभूति कभी नहीं रही. पर आज जाने क्या अलग था. मैं जैसे उस घोड़े की पीड़ा को अपने तन पर अनुभव कर सकता था. ६ घंटे के सफर का आधे से ज्यादा समय मैं उस घोड़े और उसकी पीड़ा में ही खोया रहा. घंटों बाद तक मेरे पैर उस घोड़े के दर्द से चपक रहे थे, मेरे कानों में उसके खुरो की थाप अभी तक गूँज रही थी और मैं आँख बंद करके भी उस घोड़े द्वारा सड़क पर अंकित उस असीम पीड़ा की कहानी को पढ़ सकता था. मुझे लग रहा था जैसे प्रकृति उस घोड़े के माध्यम से मुझ तक अपना कोई सन्देश पहुँचाना चाहती थी. यह चिंतन का अगला पड़ाव था. अब मैं निरंतर यह सोचने में व्यस्त था की वह क्या सन्देश है जिसका मुझ तक पहुंचना एक नियति है. चिंतन की और गहराई में जाने के पश्चात मुझे यह आभास होने लगा कि यह घोडा वस्तुतः मेरी ही आंतरिक अवस्था का प्रतिबिम्ब है. मुझे ऐसा लगने के पीछे मेरे अपने तर्क हैं. 

अब से लगभग ७-८ वर्ष पूर्व जब मैंने अपनी दुकान छोड़कर नौकरी में जाने का निश्चय किया था, उस समय मैं भी एक अश्व के जैसा ही था. मेरे भीतर अपार ऊर्जा थी, उत्साह का तेज मेरी आँखों में चमकता था और दिल आकाश तक दौड़कर जाने के स्वपन रखता था. फिर जब मैंने पब्लिक रिलेशंस छोड़कर स्वयं को पूरी तरह कलम के सुपुर्द किया तो यह मानो ऐसा था जैसे उस स्वतंत्र अश्व को अम्बर तक पहुँचने का मार्ग मिल गया हो. अब कोई मंज़िल दूर नहीं थी. लेकिन यह क्या उस घोड़े को अब दौड़ते-दौड़ते क्षुधा का आभास होने लगा था. अब वह आकाश की जगह घास तलाशने लगा. उसका मानना हो गया था कि लगातार दौड़ने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता है और ऊर्जा के लिए घास की. इसलिए उसने घास की सुलभ उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए दूसरों के लिए घुड़दौड़ में दौड़ना भी स्वीकार कर लिया. पर उसे क्या पता था, नौकरी तो आखिर नौकरी ही होती है. उसने दौड़ने के लिए खूंटे से बंधना स्वीकार कर लिया था. उसके बाद क्या था, स्वतंत्र दौड़ने के संकल्प से निकला घोडा अब सिर्फ सामान और सवारियों को ढ़ोने दस काम आने लाग था. वह दौड़ना जैसे भूल ही चुका था. बस उस घोड़े जैसी अवस्था ही थी मेरी भी. कभी अपनी क्षमताएं ही बोझ लगती थीं तो कभी निजी आवश्यकताएं व अपेक्षाएं प्रतिकूल मौसम और ज़ख्म-सी बन जाती थीं. शायद यही कारण था कि मैं उस घोड़े की वेदना को इतनी भली-भांति समझ पा रहा था. यह वेदना मेरी आंतरिक चेतना का ही प्रतिबिम्ब थी जो एक शक्ति मुझे दिखाना चाह रही थी. साथ ही वह मुझे यह भी बताना चाह रही थी कि अगर मैंने समय रहते खुद को नहीं संभाला तो मैं भी अपनी कलम की स्याही से उस घोड़े द्वारा अंकित किये गए बेबसी के चिन्ह मात्र ही उत्पन्न कर पाऊंगा. 

मेरी चेतना ने उस घोड़े की वेदना में छुपे प्रकृति के गुप्त सन्देश को पा लिया है. मैंने आजतक जो भी लिखा है, जो भी अब लिख पा रहा हूँ था भविष्य में भी जो कुछ लिखूंगा उसकी प्रेरणा वह परमशक्ति ही है. मैं तो विचारों को शब्दों की आकृति देने का एक साधन मात्र हूँ. यहाँ मैं यह संकल्प करता हूँ कि अब कलम ने जो गति पकड़ी है इसपर अब कोई विराम नहीं लगने दिया जायेगा. मैं यह बात खुद तक सीमित रखकर भी आगे बढ़ सकता था, किन्तु प्रकृति को यह बताने के लिए कि उसका सन्देश मुझ तक पहुँच चुका है, मैंने इससे कलमबद्ध करने का निश्चय किया. अब यह कलम यूं ही दौड़ती रहेगी और उसके साथ ही दौड़ती रहेगी यह ज़िन्दगी भी. 

चरिवेति, चरिवेति, चरिवेति!