खुद से खुद की सिफारिश
जब छोटे-से थे तब से सुनते आ रहे थे कि आजकल कहीं भी सिफारिश के बिना कुछ नहीं मिलता. सिफारिश के बिना स्कूल-कॉलेज में दाखिला नहीं मिलता, बैंक से लोन नहीं मिलता, नौकरी नहीं मिलती, नौकरी में तरक्की नहीं मिलती. कई बार जिससे सिफारिश लगवानी है वह नहीं मिलता, तो कभी जिस तक सिफारिश पहुंचानी है, वह नहीं मिलता. तब हमें समझ में आया कि न सिर्फ कुछ पाने के लिए बल्कि लोगों से मिलने तक के लिए सिफारिश की जरूरत पड़ती है.
अब हुआ यूं कि हमें भी एक महत्वपूर्ण व्यक्ति से मिलना था.और इसके लिए जरूरी थी किसी की सिफरिश. जानना चाहेंगे मुझे किससे मिलना था? अपने आप से!
अब आपको लग सकता है कि मैं किसी नशे में यह बात लिख रहा हूँ. पर जनाब आपका अंदाज़ा गलत है! मैं वास्तव में अपने आप से ही मिलना चाहता था. और यह काम उतना आसान नहीं होता जितना अक्सर हम समझते हैं. लोगों की पूरी उम्र बीत जाती है पर उनकी खुद से कभी सही से मुलाकात नहीं हो पाती. कुछ तो ऐसे होते हैं जो इसके लिए कभी प्रयास ही नहीं करते, कुछ थोड़ी देर कोशिश करके हार मान जाते हैं, कुछ किसी छद्म को स्वयं मानकर खुश हो जाते हैं और कुछ विरले ही ऐसे होते हैं जो वास्तव में खुद से मिल पाते हैं. यह काम कितना कठिन हैं इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद से मुलाकात होने के बाद अगली मुलाकात बस खुदा से ही होती है. यही कारण हैं कि ज्यादातर लोगों को सबसे ज्यादा भ्रम अपने आप के बारे में ही होते हैं.
मुझे भी अपने विषय में काफी भ्रम-से होने लग गए थे. ये भ्रम वास्तव में भ्रम ही हैं, मैं इसका अनुमान भी नहीं लगा पा रहा था. इसलिए इन भ्रमों से मुक्ति पाने के लिए मुझे खुद से मिलना था - वह भी शीघ्रातिशीघ्र! तभी दिमाग में आया कि अगर सीधे रास्ते से चले तो इस कार्य में कई वर्षों का समय लग सकता है. अब क्या किया जाये? सिफारिश! इसी के ज़रिये हर काम को जल्दी से बनाया जा सकता है. यह बात तो तय हो चुकी थी कि अगर खुद से मिलना है तो मुझे एक सिफारिश की जरूरत है. अब प्रश्न यह था कि खुद से मिलने के लिए किसकी सिफारिश लगायी जाए. कई दिन यह तय करने में बीत गए. अनिर्णय की अवस्था ज्यों की त्यों बनी हुई थी. इस कार्य को संपन्न करने के लिए अनेक विकल्प मेरे दिमाग में आए. कभी लगा किसी गुरु की शरण ली जाए, कभी लगा किसी अच्छे दोस्त से बात की जाए और कभी लगता कि चलो भगवान से ही पूछ लेते हैं. पर इसमें भी समस्या यह थी कि खुद से मिले बगैर तो भगवान से मिलना भी नामुमकिन है. खुद ही कुछ विकल्प सोचता था और फिर खुद ही आत्म-चिंतन करके उन्हें नकार देता था. 'सिफारिश किससे लगवायी जाए' यह प्रश्न 'सिफारिश कैसे लगवायी जाए' - इससे भी बड़ा हो चुका था. समस्या काफी विकट थी.
काफी सोच-विचार करने के बाद दिमाग में यही आया कि जब कोई काम ना आए तो इंसान को ही खुद के काम आना पड़ता है. देखिये आ गई ना वही बात! सच यही है कि अधिकतर मामलों में हम अपने आप तक ही सबसे बाद में पहुँचते हैं. वह भी हर जगह से ठुकराये जाने के बाद! खैर, मैं भी अपनी ही शरण में जा पहुंचा था. अब शुरू हुआ आत्म-संवाद का दौर. मैंने खुद को बताया कि मुझे खुद से मिलना है, और शीघ्र मिलना है. इसलिए सिफारिश की जरुरत है. खुद ने कहा - "आज मन नहीं है, कल सोचते हैं!" कल भी हो ज्ञा. मैंने फिर खुद को कल के वादे की याद दिलाई. उत्तर फिर कल वाला ही था - "आज मन नहीं है, कल सोचेंगे!" इस तरह मिन्नतें करते हुए कई दिन, हफ्ते, महीने, साल बीत गए. अब खुद के नखरों से परेशान हो चुका था. धीरे-धीरे खुद से मिलने की इच्छा भी क्षीण होती जा रही थी. तभी एक दिन मैं खुद के व्यवहार से आश्चर्यचकित रह गया. मुझे ज्ञात हुआ कि खुद कि खुद से एक संक्षिप्त मुलाकात हो चुकी है सिफारिश खुद के माध्यम से खुद तक पहुँच चुकी है. इसका असर भी काफी सकारात्मक हुआ. खुद से मेरी मुलाक़ात तय हो चुकी थी. मैं भी खुद से मिलने के लिए काफी बेकरार और पूरी तरह तैयार था. आखिर मुलाकात की बेला आई,
मैंने खुद को बताया कि मैं काफी समय से उसे ढूंढ रहा था. खुद की काफी मिन्नतें की इस मुलाक़ात को साकार करने के लिए. मिलने का प्रयोजन सिर्फ इतना है कि मुझे खुद के बारे में काफी भ्रम हो गए हैं. खुद से जवाब मिला कि मैं नहीं हूँ जिसे खुद के बारे में भ्रम है. दुनिया भर के लोगों को खुद के बारे में भ्रम है. कुछ को खुद पर ही भ्रम है और बाकी खुद ही एक भ्रम हैं. खुद से वार्ता के दौरान यह भी ज्ञात हुआ कि भ्रम और सच्चाई में कोई भेद है ही नहीं. इसका कारण यह है कि यदि हम खुद के बारे में कुछ सोच लें तो बस हम खुद ही खुद को वह बना सकते हैं या उस मुकाम तक पहुंचा सकते हैं. खुद के बारे में कोई धारणा हमें तब भ्रम लगती है जब हमें खुद पर पूरा विश्वास नहीं होता. खुद पर अगर हम खुद ही विश्वास कर लें, तो हमें खुद से तो क्या खुदा से मिलने के लिए भी किसी सिफारिश की जरुरत नहीं है. मुझे खुद की बात खूब समझ आ चुकी थी. खुद से इसका भी भरोसा मिला है कि वह समय-समय आकर मुझसे मिलता रहेगा. मुझे तो खुद की सारी बातें खुद से समझ आ गई हैं. और आपको? खुद से पूछ कर देखिये…
